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“हयग्रीव माधव मंदिर” प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम

असम के हाजो में मणिपर्वत के ऊपर “हयग्रीव माधव” मंदिर स्थित है। जहां अश्व की मुखाकृति के भगवान विष्णु के अवतार “हयग्रीव” की यहाँ पूजा होती है। संस्कृत में घोड़े को “हय” और गले को “ग्रीव” कहा जाता है। इसीलिए मंदिर का नाम “हयग्रीव” है।यह पवित्र हिंदू और बौद्ध दोनों तीर्थस्थल है, जिसे 6वीं शताब्दी में पाल वंश के राजा द्वारा बनाया गया था।
बौद्धों का मानना है कि बुद्ध ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था।

कामरूप में रचित ‘कालिका पुराण’ के अनुसार इस तीर्थस्थान की प्रतिष्ठा और्वऋषि ने की थी। भगवान विष्णु ने और्वऋषि के तपस्या भंग करने वाले पाँच असुरों का वध कर हयग्रीव माधव नामक इस पर्वत में ही अवस्थान किया।
यद्यपि यह एक प्राचीन मंदिर है, पर वर्त्तमान का ढाँचा बाद के समय का है। इतिहासकारों के अनुसार पाल राजवंशी राजाओं ने छठी शताब्दी में इसका निर्माण करवाया। काला पहाड़ के द्वारा प्राचीन मंदिर को नष्ट करने के बाद राजा रघुदेव ने 1543 में मंदिर का पुनः निर्माण करवाया। मंदिर के अंदर कोच राजा रघुदेव और आहोम राजा प्रमत्त सिंह और कमलेश्वर सिंह का शिलालेख है।
यह मंदिर पत्थर से बना है। इसके दीवार में हाथी की प्रतिमूर्तियों की एक खुबसूरत पंक्ति है। इन्हें असमिया स्थापत्य शिल्प का नमूना माना जाता है। पूरे मंदिर का ढाँचा ईट के स्तंभ के ऊपर स्थित है। मंदिर का गेट ग्रेनाइट पत्थर का है। शिखर पिरामीड आकार का है।कमरे की दोनों ओर कमल के आकार में बने हुए दो दीवारें हैं। जो बेहद आकर्षक है। मंदिर के बाहर विष्णु के दशावतार का वर्णन करते हुए भास्कर बने हुए हैं। इसके अलावा भी बहुत से भास्कर हैं,जिन्हें मैं पहचान नहीं पाया। फिर भी इतना तो तय है कि ज्यादातर पुरुषाकृति और हाथों में त्रिशूल लिए हुए हैं। मूल मंदिर के पास ही आहोम राजा प्रमत्त सिंह द्वारा निर्मित एक अन्य छोटा मंदिर भी है।

प्राचीन मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने उन राक्षसों को दंडित करने/मारने के लिए हयग्रीव के रूप में अवतार लिया, जिन्होंने ब्रम्हा देव से वेदों को चुराया था।बाहरी दीवारों पर भगवान विष्णु के 10 अवतारों, शोभायात्रा में भक्तों, रामायण और महाभारत आदि के प्रासंगिक दृश्यों को चित्रित किया गया है।

इस मंदिर के पास ही ‘माधव पोखोरी’ नाम से एक पोखर भी है। इसको माधव पुखुरी या विष्णु पुष्कर के नाम से जाना जाता है, जो कछुओं की कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है। दिलचस्प बात यह है कि कछुओं की इन प्रजातियों में से कुछ को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन वे बहुतायत में मंदिर में पाए गए। यह जानकर आश्चर्य होता है कि भारत में उपलब्ध कछुओं की कुल 29 प्रजातियों में से 14 से अधिक यहां पाई जाती हैं।

हयग्रीव महात्म्यम्:

न हयग्रीवथ परम अस्ति मंगलम

न हयग्रीवथ परम अस्ति पावनम्

न हयग्रीवथ परम अस्ति धैवतम्

ना हयग्रीवं प्रणिपत्य सीधाति!

हयग्रीवन से बड़ा कोई शुभ नहीं है। हमारे संचित पापों को नष्ट करने के लिए श्री हयग्रीवन से बढ़कर कुछ भी पवित्र नही।

यहां हर साल दौल, बिहू और जन्माष्टमी उत्सव मनाए जाते हैं।

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