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आद्यन्त, अविरल, नितनूतन स: सनातन

क्यों मनाते हैं चैत्र नवरात्रि,जानिये !

सनातन हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र नवरात्रि चैत्र से ही नए साल की शुरुआत होती है । इसी कैलेंडर के अनुसार साल के पहले महीने में पहली चैत्र नवरात्रि मनाई जाती है. जिसके बाद दूसरी नवरात्रि आषढ़ में गुप्त नवरात्रि होती है। इसके बार तीसरी नवरात्रि अश्विन माह में शारदीय नवरात्रि के तौर पर मनाई जाती है। वहीं आखिर में माघ महीने में गुप्त नवरात्रि मनाते हैं।

बता दें कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि दोनों में ही नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना करते हैं। चैत्र नवरात्रि में नौवे दिन का समापन राम नवमी के तौर पर मनाया जाता हैं। दरअसल इसी दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था।

वहीं दूसरी तरफ शारदीय नवरात्रि के नवमी के बाद दसवें दिन यानि कि आखिरी दिन मां दुर्गा ने जहां संसार के कल्याण के लिए महिषासुर का वध किया था तो वहीं इसी दिन भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का संहार किया था। इसलिए इस दिन को विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है. इसी दिन भगवान श्री राम ने फिर से धर्म की स्थापना की थी।

शास्त्रों अनुसार रम्भासुर का पुत्र था महिषासुर, जो अत्यंत शक्तिशाली था। उसने कठिन तप किया था। ब्रह्माजी ने प्रकट होकर कहा- ‘वत्स! एक मृत्यु को छोड़कर, सबकुछ मांगों। महिषासुर ने बहुत सोचा और फिर कहा- ‘ठीक है प्रभो। देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित करने की कृपा करें।’ ब्रह्माजी ‘एवमस्तु’ कहकर अपने लोक चले गए। वर प्राप्त करने के बाद उसने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा कर त्रिलोकाधिपति बन गया। सभी देवता उससे परेशान हो गए।  

तब सभी देवताओं ने आदिशक्त जगदंबा (अंबा) का आह्‍वान किया और तब देवताओं की प्रार्थना सुनकर मातारानी ने चैत्र नवरात्रि के दिन अपने अंश से 9 रूपों को प्रकट किया। इन 9 रूपों को देवताओं ने अपने-अपने शस्त्र देकर महिषासुर को वध करने का निवेदन किया। शस्त्र धारण करके माता शक्ति संपन्न हो गई। कहते हैं कि नौ रूपों को प्रकट करने का क्रम चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर नवमी तक चला। इसीलिए इन 9 दिनों को चैत्र नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

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