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October 22, 2026

प्रदोष व्रत:सोम प्रदोष का महत्व

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Importance of Som Pradosh

प्रदोष एक पाक्षिक व्रत है अर्थात प्रत्येक महीने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की प्रदोषकालीन त्रयोदशी तिथि को व्रत रखते हैं।

त्रयोदश्यां तिथौ सायं प्रदोषः परिकीर्त्तितः ।
तत्र पूज्यो महादेवो नान्यो देवः फलार्थिभिः ॥

प्रदोषपूजामाहात्म्यं को नु वर्णयितुं क्षमः ।
यत्र सर्वेऽपि विबुधास्तिष्ठति गिरिशांतिके ॥

प्रदोषसमये देवः कैलासे रजतालये ।
करोति नृत्यं विबुधैरभिष्टुतगुणोदयः ॥

अतः पूजा जपो होमस्तत्कथास्तद्गुणस्तवः ।
कर्त्तव्यो नियतं मत्र्यैश्चतुर्वर्गफला र्थिभिः ॥

दारिद्यतिमिरांधानां मर्त्यानां भवभीरुणाम् ।
भवसागरमग्नानां प्लवोऽयं पारदर्शनः ॥

दुःखशोकभयार्त्तानां क्लेशनिर्वाणमिच्छताम् ।
प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजनं मंगलायनम् ॥
स्कन्दपुराण

त्रयोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष कहा गया है। प्रदोष के समय महादेवजी कैलाश पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों को प्रदोष में नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिए। दरिद्रता के तिमिर से अंधे और भक्तसागर में डूबे हुए संसार भय से भीरु मनुष्यों के लिए यह प्रदोषव्रत पार लगाने वाली नौका है। शिव-पार्वती की पूजा करने से मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु-दुःख और पर्वत के समान भारी ऋण-भार को शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियों से पूजित होता है। प्रदोष व्रत भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है। इसमें सभी दोषो का शमन करने की क्षमता है अतः इसको प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत का आरम्भ सोमप्रदोष से उत्तम होता है।

सोम प्रदोष का महत्व

स्कन्दपुराण के अनुसार-

शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ।
सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते ॥

केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ।
न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम् ॥

उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ।
वैदिकैर्लोकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम् ।।

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्तृका ।
विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम् ॥

संसार में भगवान शिव की पूजा सदा ही स्वर्ग और मोक्ष का साधन है। यदि सोमप्रदोष के दिन यह पूजा की जाए तो उसका विशेष महात्म्य है। जो सोमवार को भगवान शंकर की पूजा करते हैं, उनके लिए इहलोक और परलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं। सोमवार को उपवास करके इंद्रियों को वश में रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मंत्रों से विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान शिव की पूजा करके मनोवांछित वर पाता है।

निशि यत्नेन कर्तव्यंभोजनं सोमवासरे।
उभयोः पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिव तत्परैः ॥

शिवपुराण, कोटिरुद्रसंहिता यानी दोनों पक्षों में प्रत्येक सोमवार को प्रयत्न पूर्वक केवल नक्तम् भोजन (रात में ही भोजन) करना चाहिए। शिव के व्रत में तत्पर रहने वाले लोगों के लिए यह अनिवार्य नियम है।

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