आज का दिन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति के दो रूपों का संगम है। वह क्षण जब भगवान विष्णु स्वयं काशी पहुँचे और भगवान शंकर की आराधना की।वैकुंठ चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि भक्ति में न कोई भेद है, न कोई सीमा — जहाँ प्रेम है, वहीं परमात्मा है। आज के दिन शिव को तुलसी अर्पित की जाती है, विष्णु को बिल्वपत्र — क्योंकि जब प्रेम सच्चा हो, तो नियम भी भक्ति का हिस्सा बन जाते हैं।
कई मंदिरों में, विशेषकर काशी विश्वनाथ मंदिर में, जहां भगवान विष्णु को इस दिन विशेष सम्मान दिया जाता है, महत्वपूर्ण उत्सव मनाया जाता है। उज्जैन में वैकुंठ चतुर्दशी को महाकालेश्वर मंदिर तक भव्य जुलूस के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु द्वारा विशेष पूजा की जाती है जिसमें भगवान विष्णु की आधी रात (निशा काल) में और भगवान शिव की सुबह (अरुणोदय मुहूर्त) में पूजा की जाती है।
धार्मिक नगरी उज्जैन इन दिनों आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को पड़ने वाली वैकुंठ चतुर्दशी, महाकालेश्वर और भगवान विष्णु (हरि) के दिव्य मिलन का प्रतीक है – जिसे “हरि हर मिलन” के नाम से जाना जाता है।
किवदंती है कि इस रात भगवान विष्णु स्वयं महाकाल से मिलने उज्जैन आते हैं। जब हरि (विष्णु) और हर (शिव) मंदिर परिसर में एकाकार होते हैं, तो पूरा उज्जैन “हर हर महादेव” और “जय श्री हरि” के जयकारों से गूंज उठता है। यह दृश्य भक्तों के लिए किसी दिव्य उत्सव से कम नहीं होता – मानो ब्रह्मांड की दो महान शक्तियाँ एक हो गई हों।
इस विशेष रात्रि में, भक्त दीपदान करते हैं, जप करते हैं, ध्यान करते हैं और महाआरती करते हैं। शिप्रा नदी के घाट दीपों की रोशनी से जगमगा उठते हैं और उज्जैन का वातावरण स्वर्ग जैसा लगता है।ऐसा कहा जाता है कि इस दिन की साधना से संतुलन, प्रेम और मोक्ष की प्राप्ति होती है – क्योंकि जब “हरि” और “हर” मिलते हैं, तो ब्रह्मांड स्वयं मुस्कुरा उठता है।
















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