Complete-tarpan-vidhi-for-rishis-and-ancestors: सनातन धर्म में तर्पण एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण कर्मकांड है, जो देवताओं, ऋषियों तथा पितरों को जल अर्पित कर उनकी तृप्ति करने का माध्यम है। विशेष रूप से पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान यह विधि वंशजों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होती है। तर्पण से पूर्वजों को शांति मिलती है, वंश वृद्धि होती है तथा समस्त पापों का नाश होता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, “तर्पणं कृत्वा विप्राः पितॄनुद्दिश्य ततः श्राद्धं करिष्यन्ति” – अर्थात् तर्पण के बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
इस लेख में हम देव, ऋषि और पितरों के लिए पूर्ण तर्पण विधि का सरल व विस्तृत वर्णन करेंगे। यह विधि घर पर ही आसानी से की जा सकती है। यदि आप नदी या तीर्थ पर हैं, तो उसी अनुसार समायोजन करें। आइए, जानें कैसे करें यह पवित्र कर्म।
तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री
तर्पण विधि में शुद्धता सर्वोपरि है। निम्नलिखित सामग्री एकत्र करें:
- पात्र: सोना, चांदी, तांबा या कांसा का (पितृ तर्पण के लिए शुभ; मिट्टी या लोहे का वर्जित)।
- जल: शुद्ध जल या गंगाजल (तिल मिश्रित)।
- अन्य: कुशा घास (दर्भ), तिल (काले या सफेद), अक्षत (चावल), दूध, फूल, गमछा, यज्ञोपवीत (जनेऊ), चंदन, कुमकुम।
- वैकल्पिक: जौ, गुलाब की पंखुड़ियां, सिक्का (तर्पण के समय उपयोग के लिए)।
नोट: तर्पण अमावस्या, संक्रांति, ग्रहण या व्यतीपात योग के दिन विशेष फलदायी है। घर में भी किया जा सकता है, किंतु शुद्ध स्थान चुनें।
तर्पण से पूर्व तैयारी
- शुद्धिकरण: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर आसन ग्रहण करें।
- आचमन और प्राणायाम: तीन बार आचमन करें। गायत्री मंत्र जपें।
- कुशा बंधन: कुशा से पंचबंधन करें। दाएं अंगूठे में दो कुशा बांधें, बाएं में तीन।
- संकल्प: दाएं हाथ में पात्र, कुशा, तिल, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें: ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद् भगवते वासुदेवाय नमः। मम आत्मनः सर्व पातक निवारणार्थं सर्व मंगल कार्य सिद्ध्यर्थं, अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वर्ण मन्वन्तरे वैवस्वत मन्वन्तरे कलियुगे प्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरत खण्डे सरस्वती तीरे (अपने स्थान का नाम) नामक ग्रामे (नगरे) वर्तमाने वर्तमान समये, माता (माता नाम) पुत्री (पिता नाम) पुत्र (स्वयं नाम) अहं (गोत्र नाम) गोत्रः पितृ तृप्त्यर्थं देव ऋषि पितृ तर्पणं करिष्ये। (अपने नाम, गोत्र आदि अनुसार संशोधित करें।)
देव तर्पण विधि
देवताओं का तर्पण पूर्व दिशा में किया जाता है, जो सृष्टि के स्रोत का प्रतीक है। यह कर्म देवऋण चुकाने के लिए आवश्यक है।
- आसन: पूर्वमुखी होकर दाएं घुटने को भूमि पर लगाकर बैठें। यज्ञोपवीत सव्य (बाएं कंधे पर) रखें।
- तैयारी: पात्र में जल-तिल मिश्रण भरें। कुशा के तीनों भाग पूर्व की ओर रखें। थाली में चावल डालें।
- आह्वान: देवताओं का आह्वान करें – “ॐ देवतेभ्यो नमः”।
- तर्पण: दाएं हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग (देवतीर्थ) से जल लेकर ऊंचा उठाएं (गौ के सींग जितना)। निम्न मंत्रों से एक-एक अंजलि अर्पित करें:
- ॐ ब्रह्मणे तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ विष्णवे तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ रुद्राय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ प्रजापतये तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ देवेभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा।
- ॐ अर्यम्णे तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा। (कुल 10-12 देवताओं तक)
- समापन: “ॐ देवतेभ्यो नमः” कहकर प्रणाम करें।
ऋषि तर्पण विधि
ऋषि तर्पण उत्तर दिशा में होता है, जो ज्ञान का प्रतीक है। यह आचार्य ऋण चुकाता है।
- आसन: उत्तरमुखी होकर सीधे बैठें। यज्ञोपवीत सव्य रखें।
- तैयारी: पात्र में जल-तिल-अक्षत मिलाएं। कुशा के मध्य भाग उत्तर की ओर।
- आह्वान: “ॐ ऋषिभ्यो नमः”।
- तर्पण: बाएं हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग (ऋषितीर्थ) से जल अर्पित करें। मंत्र:
- ॐ कश्यपाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ अत्रे तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ वशिष्ठाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ विश्वामित्राय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ गौतमाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ भारद्वाजाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ जमदग्नये तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ कौशिकाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ गार्ग्याय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ अत्रेयाय तृप्यताम् तृप्यस्व स्वाहा।
- ॐ ऋषेभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा।
- समापन: प्रणाम करें।
पितृ तर्पण विधि
पितरों का तर्पण दक्षिण दिशा में, जो मोक्ष का द्वार है। यह पितृऋण चुकाने के लिए अनिवार्य है।
- आसन: दक्षिणमुखी होकर बाएं घुटने को भूमि पर लगाकर बैठें। यज्ञोपवीत अपसव्य (दाएं कंधे पर) रखें।
- तैयारी: पात्र में जल-तिल-दूध मिश्रण। कुशा के मूल और अग्रभाग दक्षिण की ओर।
- आह्वान: “ॐ पितृभ्यो नमः”। अपने पितरों (पिता, दादा आदि) का स्मरण करें।
- तर्पण: दाएं हाथ के कनिष्ठिका (पितृतीर्थ) से जल अर्पित करें। मंत्र (माता-पिता-पितामह आदि क्रम से):
- ॐ पितृभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा।
- ॐ पितामहेभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा।
- ॐ प्रपितामहेभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा।
- ॐ मातृभ्यः तृप्यन्तां तृप्यन्तु स्वाहा। (कुल तीन पीढ़ियों तक)
- समापन: “ॐ पितृभ्यो नमः” कहकर प्रणाम। ब्राह्मण को दान दें यदि संभव हो।
तर्पण के लाभ और सावधानियां
तर्पण से पितर प्रसन्न होते हैं, जिससे संतान सुख, धन-धान्य और दीर्घायु प्राप्ति होती है। मनुस्मृति कहती है, “पितृभक्तः सर्वदा सुखी”।
सावधानियां:
- विधवा या अविवाहित स्त्री तर्पण न करें; पुरुष ही करें।
- मासिक धर्म में महिलाएं न छुएं।
- शुद्ध मन से करें; क्रोध या विकृति में न करें।
- यदि संभव हो, तो पंडित से करवाएं।
पितृ पक्ष में यह कर्म अवश्य करें। अधिक जानकारी के लिए हमारे अन्य लेख पढ़ें। जय श्री राम!
संदर्भ: स्वामी रूपेश्वरानंद जी की तर्पण विधि, गरुड़ पुराण। SanatanYatra.in– आपकी आध्यात्मिक यात्रा का साथी











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