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आद्यन्त, अविरल, नितनूतन स: सनातन

#LingarajaTemple: शिव और विष्णु का स्थान लिंगराज मन्दिर

@Sanatanyatra

#सनातनयात्रा : भुवनेश्वर के बीजू पटनायक इण्टरनेशनल एयरपोर्ट से उत्तर पूर्व में बमुश्किल डेढ़ किलोमीटर चलते ही एक भव्य विमान (मन्दिर का शिखर) नजर आने लगता है। जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, इसकी ऊंचाई और भव्यता मोहित करने लगती है। यह लिंगराज मन्दिर है, भुवनेश्वर की सबसे पुरानी संरचनाओं में से एक। भगवान त्रिभुवनेश्वर (शिव) को समर्पित इस मन्दिर के पीठासीन देवता भगवान हरिहारा हैं। प्रतिदिन करीब छह हजार श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन को आते हैं।

लिंगराज का अर्थ है “लिंगम के राजा” जो यहां भगवान शिव को कहा गया है। वास्तव में यहां शिव की पूजा कृतिवास के रूप में की जाती थी और बाद में हरिहारा नाम से की जाने लगी। हरि का अर्थ है भगवान विष्णु और हारा का भगवान शिव। मन्दिर का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि यह ओडिशा में शैव और वैष्णव सम्प्रदायों के समन्वय का प्रतीक है। इसका एक कारण सम्भवतः यह हो सकता है कि पुरी के जगन्नाथ और लिंगराज मन्दिर दोनों का विकास एक ही समय पर हुआ है।

लिंगराज मन्दिर का इतिहास

इस मन्दिर का इतिहास काफी पुराना है। इतिहासकारों के मुताबिक सोमवंशी सम्राज्य के शासक जजाति केशरी प्रथम (1025-1040) ने  जब अपनी राजधानी जाजपुर से भुवनेश्वर स्थानान्तरित की थी, तब उन्होंने 11वीं सदी में इस मन्दिर का निर्माण शुरू करवाया था। राजा लालतेन्दु केशरी के शासनकाल में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि यह मन्दिर किसी अन्य रूप में छठी शताब्दी के बाद से मौजूद है क्योंकि सातवीं शताब्दी की पाण्डुलिपि और ब्रह्म पुराण में इसका उल्लेख किया गया है।

लिंगराज मन्दिर की वास्तुकला

लिंगराज मन्दिर की वास्तुकला ओडिशा की मन्दिर वास्तुकला की सर्वोत्कृष्ट शैली का प्रतिनिधित्व करती है जिसे कलिंग शैली या ओडिशा शैली के नाम से जाना जाता है। 2,50,000 वर्ग फुट के विशाल क्षेत्र में विस्तृत यह मन्दिर बिन्दुसागर झील के आसपास बनाया गया है और किले की दीवारों से घिरा हुआ है। मंदिर परिसर में लगभग 150 छोटे-छोटे मन्दिर हैं। विशाल आकार, जटिल नक्काशी और ऊंची मीनारें इसकी विशेषताएं हैं। इसको बनाने में गहरे रंग के बलुआ पत्थरों और ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया है। इसकी वास्तुकला की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:-

देउल : यह इष्टदेव भगवान शिव का मुख्य गर्भगृह है। इस विशाल संरचना का निर्माण रेखा देउल शैली में किया गया है। इसमें कई क्षैतिज स्तर होते हैं जिन्हें पिढ़ा कहा जाता है जो धीरे-धीरे ऊपर की ओर सिकुड़ते जाते हैं। इसे देवी-देवताओं और पौराणिक दृश्यों को चित्रित करने वाली जटिल नक्काशी से सजाया गया है।

जगमोहन : देउल के सामने स्थित इस संरचना को जगमोहन या सभास्थाल कहा जाता है। यह पिरामिडनुमा छत वाली एक आयताकार संरचना है।

विमान : लिंगराज मंदिर का मुख्य टॉवर या विमान संरचना का सबसे ऊंचा हिस्सा है। यह देउल से ऊपर उठता है। इस पर देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों और पौराणिक कथाओं के दृश्यों को दर्शाती मूर्तियां उकेरी गयी हैं।  यह 55 मीटर ऊंचा है। इसके शीर्ष पर एक सुनहरा कलश है।

मुखशाला (प्रवेश द्वार) : यह मुख्य गर्भगृह की ओर जाने वाला प्रवेश द्वार है। इसको दिव्य युवतियों, संगीतकारों, नर्तकियों और पौराणिक प्राणियों को चित्रित करने वाली नक्काशीदार मूर्तियों से सजाया गया है।

नाटा-मण्डप (नृत्य कक्ष) : मन्दिर परिसर के बाहरी हिस्से की ओर एक अलग हॉल है जिसे नाटा-मण्डप के नाम से जाना जाता है। इसका इस्तेमाल धार्मिक समारोहों, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए किया जाता है। इसमें जटिल नक्काशीदार खम्भे और छतें हैं।  

पत्थर की नक्काशी : यह मन्दिर अपनी उत्कृष्ट पत्थर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। पूरा परिसर देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों, जानवरों, पुष्प रूपांकनों और ज्यामितीय पैटर्न को चित्रित करने वाली जटिल मूर्तियों से सजाया गया है।

मन्दिर परिसर : लिंगराज मन्दिर केवल एक संरचना नहीं है बल्कि एक विशाल परिसर है जिसमें विभिन्न देवताओं को समर्पित कई मन्दिर शामिल हैं।

लिंगराज मन्दिर में उत्सव

इस मन्दिर में हर साल कई त्योहार मनाए जाते हैं जो पर्यटकों के बीच आकर्षण का केन्द्र होते हैं। इनमें चन्दन यात्रा, रथ यात्रा और शिवरात्रि प्रमुख हैं। इनमें भी शिवरात्रि पर्व की सबसे अधिक मान्यता है। फाल्गुन मास में मनाए जाने वाले इस त्योहार पर भगवान हरिहारा को प्रसाद चढ़ाने के लिए हजारों भक्त मन्दिर में दिनभर उपवास रखते हैं। मुख्य उत्सव रात को होता है जब श्रद्धालु महादिप के प्रकाश के बाद अपना उपवास तोड़ते हैं। चन्दन यात्रा (चन्दन समारोह) 22 दिन का होता है। इस अवधि में नृत्य, सामूहिक भोज और जलसेक की व्यवस्था की जाती है। अशोकाष्टमी पर रथ पर बैठे देवता को रामेश्वर देउला मन्दिर ले जाया जाता है। भक्तगण लिंगराज और उनकी बहन रुक्मणी के भव्य रथों को खींचते हैं जिसे भगवान की सबसे बड़ी सेवा माना जाता है। माना जाता है जो भक्त शिव के दर्शन के लिए लिंगराज मन्दिर नहीं जा पाते, भगवान उनको दर्शन देने के लिए स्वयं मन्दिर से बाहर निकलते हैं।

ऐसे कर सकते हैं दर्शन

मन्दिर में गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है। अभिषेक और दर्शन करने के लिए मन्दिर में पहुंच कर ही टिकट खरीदना होता है, ऑनलाइन टिकट की व्यवस्था नहीं है। श्रद्धालु बिन्दुसागर झील में स्नान कर क्षेत्रपति अरन्त वासुदेव के दर्शन करते हैं। गणेश पूजा के बाद गोपारिणी देवी और भगवान शिव के वाहन नन्दी की पूजा की जाती है। इसके बाद लिंगराज की पूजा के लिए गर्भगृह में प्रवेश करते हैं जहां ग्रेनाइट का करीब एक फुट ऊंचा और आठ फीट घेरे वाला स्वयम्भू लिंग स्थित है। पूजन के दौरान पुरुषों को कुर्ता और धोती अथवा पायजामा पहनना होता है। महिलाएं साड़ी, पंजाबी ड्रेस दुपट्टे के साथ, हाफ साड़ी या फिर सूट पहन सकती हैं।

मन्दिर में कैमरा, मोबाल फोन, चमड़े की कोई भी सामग्री, पॉलिथिन और बैग ले जाने की अनुमति नहीं है। फोटोग्राफी करना भी पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित है।

दर्शन का समय

मन्दिर खुलने का समय तड़के दो बजे है। ढाई बजे मंगल आरती होती है। चार बजे बल्ल्व भोग लगता है। प्रातः छह से 10 बजे तक मन्दिर में पास से दर्शन कर सकते हैं। सुबह 10 से 11 बजे तक छप्पन भोग लगता है। शाम को पांच से छह बजे तक फिर आरती होती है। रात्रि 10 बजे बड़ा श्रृंगार होता है। साढ़े दस बजे मन्दिर के पट बंद हो जाते हैं।

कब जायें

नवम्बर से 15 मार्च के बीच भुवनेश्वर में मौसम बहुत ही सुहावना होता है। सर्दियों के दौरान तापमान कई बार सात डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इस दौरान श्रद्दालु लिंगराज मन्दिर के अलावा इस्कॉन मन्दिर, मुक्तेश्वर मन्दिर, ओल्ड टाउन, बीजू पटनायक पार्क, चण्डका वन्यजीव अभयारण्य (पचीडर्म देश) आदि जा सकते हैं। मध्य़ मार्च से जून के दूसरे सप्ताह के बीच भुवनेश्वर का मौसमगर्म और आर्द्र होता है। हालांकि इस दौरान शामें ठण्डी और सुखद होती हैं। भुवनेश्वर में मानसून प्रायः मध्य जून तकदस्तक दे देता है और सितम्बर के आखीर में विदा हो जाता है। इस दौरान अक्सर भारी वर्षा होती है।

ऐसे पहुंचें

वायु मार्ग : निकटतम हवाईड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक इण्टरनेशनल एयरपोर्ट से मन्दिर करीब साढ़े तीन किलोमीटर पड़ता है।

रेल मार्ग : भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन लिंगराज मन्दिर से महज साढ़े चार किलोमीटर दूर है। पुरी, कटक, हावड़ा, दिल्ली, लखनऊ, पुणे, बीकानेर, रामेश्वरम, मुम्बई आदि से यहां के लिए ट्रेन मिलती हैं।

सड़क मार्ग : भुवनेश्वर ओडिशा की राजधानी है और पूरे राज्य के साथ बहुत अच्छे सड़क नेटवर्क से जुड़ा है। यह पुरी से करीब 63, कटक से 26, पारादीप से 105, कोलकाता से 442 और दिल्ली से लगभग 1,793 किलोमीटर दूर है।

मन्दिर की पौराणिक कथा

भगवान शिव ने एक बार देवी पार्वती को बताया कि वह भुवनेश्वर को काशी के ऊपर रखते हुए उसका पक्ष क्यों लेते हैं। इस पर भुवनेश्वर शहर का पता लगाने के लिए देवी पार्वती एक सामान्य मवेशी के रूप में वहां पहुंची। जब वह खोजबीन कर रही थीं तो क्रिति और वासा नाम के दो राक्षस वहां आए और उनके साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा।  लगातार मना करने के बावजूद जब वे उनका पीछा करते रहे तो स्वयं को बचाने की प्रक्रिया में देवी पार्वती ने उन दोनों का वध कर दिया। इस युद्ध के बाद जब देवी पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव यहां अवतरित हुए और बिंदु सरस झील का निर्माण किया जो कि अब बिन्दुसागर झील के नाम से जानी जाती है। 1,300 फुट लम्बी व 700 फुट चौड़ी यह झील लिंगराज मन्दिर के उत्तर में है। जनश्रुति है कि इस झील में भारत की सभी पावन नदियों, झीलों, कुण्डों और सरोवरों का पवित्र जल मिश्रित है। इसके मध्य में एक द्वीप है जहां प्रतिवर्ष लिंगराज की प्रतिमा को मन्दिर से लाकर भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है। बिन्दुसागर झील के पश्चिमी तट पर एकामरा वन नाम का बगीचा है। कुछ हिन्दू धर्मग्रन्थों में भुवनेश्वर की राजधानी ओडिशा को एकामरा वन या आम के पेड़ के वन  के रूप में सन्दर्भित किया गया था।

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