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October 20, 2026

सनातन संस्कृति : लाभदायक है शिखा और जनेऊ धारण करना, जानिए वैज्ञानिक कारण

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शिखा और जनेऊ धारण

विशाल गुप्ता अजमेरा @sanatanyatra. सनातन संस्कृति के हर छोटे-बड़े प्रतीक या हर छोटी-बड़ी बातें अत्यन्त महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं, वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरी हैं। सनातन संस्कृति में जन्म पूर्व यानि गर्भावस्था से लेकर मृत्यु तक की यात्रा 16 संस्कारों में पूर्ण होती है। इसी तरह सनातन संस्कृति के चिह्न जैसे शीश पर शिखा, कंधे पर जनेऊ और माथे पर तिलक धारण करना भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके पीछे भी विज्ञान छिपा है। आइये जानते हैं क्यों जरूरी है शिखा और जनेऊ ?

सनातनी पद्धति के 16 संस्कारों में एक अतिमहत्वपूर्ण है यज्ञोपवीत संस्कार। इसके अन्तर्गत किशोरावस्था प्रारंभ होते ही ब्रतबंध कराया जाता है। इसमें कंधे पर जनेऊ और शीश पर शिखा धारण करवाकर जीवन के महत्वपूर्ण दायित्व पूर्ण करने का व्रत दिलवाया जाता है। सनातन संस्कृति में चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष माने जाते हैं। इन्हीं को प्राप्त करने हेतु ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास आश्रम की व्यवस्था है। इसी के अधार पर जीवन संचालन के व्रत को धारण करने का संस्कार ही यज्ञोपवीत संस्कार है।

जनेऊ धारण करने का वैज्ञानिक कारण

आमतौर पर जनेऊ तीना धागों का बनाया जाता है। इसे बनाने के भी विशेष नियम हैं, कोई भी नहीं बना सकता। कर्म एवं वर्णानुसार जनेऊ सूत अथावा मूंज का धारण किया जाता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। जनेऊ को बाएं कंधे के ऊपर धारण करते हुए दाहिनी भुजा के नीचे पहना जाता है।

कुछ वर्ष पूर्व लंदन में हुए एक शोध में जनेऊ धारण की वैज्ञानिकता को परखा गया। इस शोध के अनुसार मल-मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटना वैज्ञानिक है। शौच के समय जनेऊ को कान के ऊपर लपेटने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से होता है और इन नसों पर दबाव पड़ने से पेट अच्छे तरीके से साफ होता है। कब्ज की समस्या दूर होती है।

जनेऊ पहनने वाले लोगों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की समस्या नहीं होती है। जनेऊ से शरीर में रक्त प्रवाह सही तरीके से होता रहता है।

रोजाना कान पर जनेऊ रखने से मेमोरी यानि स्मरण शक्ति बेहतर होती है। कान पर दबाव पड़ने से मस्तिष्क की वे नसें खुल जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्ति से होता है। ये ठीक वैसे ही जैसे पुराने दिनों में जो बच्चे पाठ भूल जाते थे, उनके शिक्षक बच्चों को मुर्गा बनाते थे या कान पकड़कर खड़ा कर दिया करते थे।

इसके अतिरिक्त लघुशंका के समय भी जनेऊ को कान पर लपेटा जाता है। बाद में हाथ धोकर ही कान से उतारने का नियम है। इससे स्वच्छता भी रहती है। साथ ही जीवन में संयम भी रहता है।

शीश पर शिखा धारण करने का वैज्ञानिक कारण

शिखा भी जनेऊ की तरह ही महत्वपूर्ण है। छोटी सी शिखा और जनेऊ का परित्याग करना मानो अपने कल्याण का परित्याग करना है। प्रकृति ने मानव-शरीर को इतना सबल बनाया हैं कि वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन कर जाता है, लेकिन शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर चोट लगने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहा जाता हैं।

शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता है। मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त (भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाड़ियों व संधियों का मेल होता है उसे ’अधिपतिमर्म’ कहा जाता हैं। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो सकती है। शीश पर शिखा इस स्थान का सुरक्षा कवच है। शिखा को शरीर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र माना जाता है। यहीं से हमारे मन-मस्तिष्क में अच्छे विचार और दैवीय अनुदान और वरदान आकर्षित होते हैं। शिखा रखने के अन्य लाभ इस प्रकार हैं–

1- शिखा और जनेऊ के नियमों का पालन करने से सद्बुद्धि, सद्विचारादि की प्राप्ति होती है। आत्मशक्ति प्रबल बनती है।
2- मनुष्य धार्मिक, सात्विक व संयमी बना रहता हैं।
3- जीवन में भौतिक सुख तथा परलोक में सदगति प्राप्त होती है।
4- सभी नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।
5- मानव जीवन स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता है।
6- आंख, कान, नाक आदि सभी ज्ञानेंद्रियों, कर्मेंद्रियों की गुणवत्ता बनी रहती हैं।
7- शरीर स्वस्थ, मन स्वच्छ, भावनाएं पवित्र और कर्म उत्कृष्ट रहते हैं।
8- जीवन में जिम्मेदारी, बहादुरी, ईमानदारी और समझदारी बढ़ती है।
9- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।

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